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अमरीश पुरी: जिन्हें सभी सहृदय इंसान के रूप में जानते हैं

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. जिन्हें सभी सहृदय इंसान के रूप में जानते हैं, वे न केवल एक शानदार अभिनेता थे, बल्कि एक अद्भुत व्यक्ति थे।

जब 12 जनवरी 2005 को अमरीश पुरी की मृत्यु हो गई थी तब कमल हासन ने कहा था “पुरी साब ने चाची 420 में मेरे साथ प्रमुख किरदार निभाया था। मैंने फिल्म में महिला का रूप लिया था। फिल्म के दौरान वे सदैव मेरे साथ रहे। पुरी साब एक नेकदिल इंसान थे। चाची 420 के बाद से हम लगातार संपर्क में रहे। वे वाकई में एक सज्जन व्यक्ति थे। ”

तीन भाइयों में सबसे छोटे अमरीश के दोनों बड़े भाई चमन पुरी और मदन पुरी अमरीश से बहुत से पहले अभिनेता थे। 40 साल की उम्र में उन्होंने एक अभिनेता के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। उनकी पहली स्क्रीन उपस्थिति 1971 में आई सुनील दत्त की फिल्म रेशमा और शेरा में दिखी थी, जहां उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ अपनी शुरुआत की थी। संयोग से दोनों को हिंदी सिनेमा में अब तक सुनी जाने वाली दो सबसे अच्छी आवाजों के रूप में जाना जाता है। और यह भी संयोग है कि उनकी मृत्यु से एक पखवाड़े पहले ही उन्होंने अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों में वॉइस ओवर प्रदान किया था, जिसमें अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था।

पुरी ने पहली बार 1975 में श्याम बेनेगल की निशांत में दर्शकों और आलोचकों ने उन्हें नोटिस किया, जिसमें उन्होंने एक क्रूर जमींदार की भूमिका निभाई थी। कला फिल्मों में उन्हें तत्काल सफलता मिली थी हालांकि मुख्यधारा की सिनेमा के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है।

दबंग आवाज के मालिक अमरीश ने मुझसे एक बार कहा था। “ वे साल मेरे लिए आसान नहीं थे, पहचान मिलना मुश्किल था, पर मुझे परिवार का पूरा सपोर्ट था। उस समय मेरे पास खलनायक के जो भी रोल आए, मैं उन्हें निभाता चला गया। ”छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाने के वर्षों के संघर्ष के बाद मुझे 1987 में मिस्टर इंडिया में मोगेम्बो का किरदार मिला, जिससे मुझे घर-घर पहचाना जाने लगा। शोले के गब्बर सिंह के बाद से हिंदी फिल्मों की खलनायकी में यह दूसरा नाम था, जिसे लोग आज भी याद करते हैं।

असंख्य फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाने के बाद पुरी के करियर में चरित्र अभिनेता के रूप में नई जान फूंकी 1992 में आई कुकू कोहली की फूल और कांटे और प्रियदर्शन की मुस्कुराहट ने। ये दोनों ऐसी फिल्में थीं, जिन्होंने उन्हें फिल्म जगत में एक चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित कर दिया। मुख्य कलाकार के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य अभिनेता को अमरीश पुरी की तरह सम्मान मिला हो। डेविड धवन की मुझसे शादी करोगी में प्रियंका चोपड़ा के संदिग्ध और तेजतर्रार पिता की भूमिका हो या प्रियदर्शन की हलचल में अक्षय खन्ना के चिड़चिड़े और उग्र पिता की भूमिका दोनों में उन्होंने बड़े पर्दे पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई।

आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में गृहस्थ एनआरआई के रूप में, प्रियदर्शन के विरासत में उदार सामंती जमींदार, राजकुमार संतोषी की घातक में सनी देओल के बीमार आदर्शवादी पिता हो या अनिल शर्मा की गदर में अमीषा पटेल के भारत विरोधी पिता, हर भूमिका के साथ उन्होंने न्याय किया है। ये सभी किरदार मुख्यधारा की सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर हैं। उन्हें उनकी आवाज पर गर्व था और वे उसके प्रति काफी पजेसिव थे। मुझे याद है कि एक साक्षात्कार के बाद उन्होंने मुझसे टेप से अपनी आवाज मिटाने का अनुरोध किया था।

मैं नहीं चाहता कि लोग मेरी आवाज का गलत उपयोग करें। कौन जानता है कि इसका किस तरह उपयोग किया जा सकता है? आज सच में वह आवाज चली गई, जिनकी आवाज से निकले तीन शब्दों मोगैम्बो खुश हुआ, हर व्यक्ति की जुबान पर आ गए। अमरीश पुरी के साथ खलनायकी और चरित्र अभिनय का एक युग समाप्त हो गया है।

वर्धन पुरी को गर्व है कि अमरीश पुरी जैसे सशक्त अभिनेता उनके दादा हैं। अपने शानदार दादा के बारे में बताते हुए वर्धन कहते हैं, “मैं भाग्यशाली हूं कि मेरे जीवन के 15 वर्षों तक मैं मेरे दादू के साथ रहा। हम साथ रहते थे। मैं उनके बगल वाले कमरे में रहता था। एक भी रात ऐसी नहीं बीती, जब मैं अपने दादू और दादी के बीच सोने नहीं गया।”
दिलचस्प बात यह है कि वर्धन के पिता ने अभिनय में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। वर्धन कहते हैं, “मेरे पिताजी पूरी दुनिया घूमना चाहते थे। यही उनकी महत्वाकांक्षा थी इसलिए वे नौसेना में शामिल हो गए। मैं बचपन से ही एक अभिनेता था।

चूंकि वर्धन के दादू ने क्रूर खलनायक की कई भूमिकाएं निभाई थी, इसलिए वर्धन उनके बुरे आदमी के किरदारों की प्रशंसा करते हुए ही बड़े हुए है। उनका कहना है कि उन्हें फिल्मों में मतलबी इंसान का किरदार निभाते देख मुझे खुशी होती थी परंतु जब वे फिल्मों में मारे जाते थे तो मुझे बहुत गुस्सा आता था। लंदन में मैं अपने शिक्षकों से पूछता रहा कि अपनी आवाज में बैस कैसे लाऊं। शायद ऐसा इसलिए था कि मेरे दादाजी को उनकी दबंग आवाज के लिए जाना जाता है। लेकिन मुझे सिखाया गया कि उनकी आवाज के बजाय उनके गुणों को खुद में ढालने की कोशिश करो। मेरे दादू वास्तव में अपनी तरह के अकेले ही इंसान थे।

जन्मदिन पर विशेष: अमरीश पुरी की यादगार फिल्में!

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