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Grahan Review: 1984 के नरसंहार की झकझोर देने वाली कहानी है ग्रहण!

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ग्रहण (Grahan)- डिज्नी-हॉटस्टार, 8 एपिसोड

कलाकार: पवन मल्होत्रा, जोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर, वामिका गब्बी अभिनीत

निर्देशक: रंजन चंदेल

रेटिंग: 4 स्टार

ग्रहण OTT Series: 1984 में हुए नरसंहार में हजारों सिखों को मार दिया गया था। उस समय मैं किशोर था और इस घटना से स्तब्ध रह गया था। जाने-माने राजनेताओं और यहां तक कि राजनीति से प्रेरित मनोरंजन जगत की हस्तियों ने जनता को अपनी प्रिय प्रधानमंत्री की हत्या के लिए एक पूरे समुदाय से बदला लेने के लिए उकसाया। मैं मौत के उस नंगे नाच को अभी तक नहीं भूल पाया, जो 31 अक्टूबर की रात को शुरू हुआ और 2 नवंबर को मेरे जन्मदिन तक जारी रहा।

गुणवत्तापूर्ण फिल्में बनाने के लिए पहचाने जाने वाले निर्माता अजय राय (जिन्होंने 2014 में मराठी की उत्कृष्ट फिल्म किल से लेकर 2014 तक कई महत्वपूर्ण सिनेमाई प्रोजेक्ट में निवेश किया है, जिनमें हाल ही की उपलब्धि फायर इन द माउंटेंस भी शामिल है ) ने 1984 के नरसंहार के घावों को खोलकर रख दिया है, वे घाव जो कभी ठीक नहीं हुए, जिन्हें कभी ठीक नहीं किया गया।

रंजन चंदेल द्वारा निर्देशित, ग्रहण , 8 एपिसोड की इस कहानी एक निश्चित सुसंगत गति है। हालांकि फिल्म दो टाइम जोन, वास्तव में तीन टाइम जोन में एक साथ चलती है। परंतु कथानक इतना कसा हुआ है कि आप को कहीं भी झटका महसूस नहीं होता है, आप कहानी में बहते चले जाते हैं।

कहानी स्पष्ट रूप से नाटकीय है और ऐसी ही होनी चाहिए। उन तीन घातक रातों में दिल दहला देने वाली क्रूरता और बर्बरता दिखाई दी थी, जब सिखों को उनके घरों से बाहर निकालकर उन्हें जिंदा जला दिया गया था। बोकारो उन शहरों में से एक था, जो नरसंहार से सबसे ज्यादा प्रभावित था। यहीं पर ग्रहण का सेट तैयार कर इसी लोकेशन पर दृश्य फिल्माए गए। कमलजीत नेगी ने अपनी सिनेमैटोग्राफी के माध्यम से 1984 के उन छोटे उत्तर भारतीय शहरों को उत्कृष्ट तरीके से दर्शाया है, जो आज भी विकसित नहीं हुए हैं।

1990 के दशक में जब एक खोजी पत्रकार को शहर के एक प्रमुख राजनेता के खिलाफ 1984 की घटना को लेकर महत्वपूर्ण सबूत मिलता है तो दो गुंडों द्वारा उसकी हत्या करवा दी जाती है। वेब सीरीज का यह दृश्य बरबस ही आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेगा। ग्रहण में दर्शकों को 1984 के दंगों के दोषियों के पकड़ने के लिए की जाने वाले जांच के बारे में भी बताया गया है। जांच के दौरान युवा और साहसी महिला पुलिस अधिकारी अमृता सिंह (जोया हुसैन) को पता चलता है कि वह जिस पिता की पूजा करती है, वे भी 1984 में बोकारो में हुई लूटपाट और आगजनी के दौरान मौजूद थे।

सच कहा जाए तो ग्रहण अमृता की कहानी नहीं है। यह दंगे के दौरान पीड़ा झेलने वाले हर व्यक्ति की कहानी है। जोया हुसैन ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है, जो कहानी को एक आंतरिक मजबूती प्रदान करता है। दरअसल, यह उनके पिता गुरुसेवक सिंह की कहानी है। उनका अतीत कैसे उनकी बेटी के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करता है, यह फिल्म में दर्शाय गया है।

दर्शकों को 1984 के समय में ले जाने वाले परेशान सिख की भूमिका निभाने वाले पवन मल्होत्रा ने अपने सशक्त अभिनय से फिर यह दर्शा दिया है कि वर्तमान में वे भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार अभिनेताओं में से एक हैं। और उन्हें उनकी काबिलियत के हिसाब से कम काम मिला है। अंत में जब वे कोर्ट रूम में बोलते हैं, तो उनका दर्द ज्यादातर उनकी आंखों से व्यक्त हो जाता है।  यह कमजोर बूढ़ा आदमी उस पूरे समुदाय के लोगों का प्रतीक बनकर सामने आता है, जिन्होंने दंगो की पीड़ा झेल है। मैं पवन मल्होत्रा के बिना ग्रहण की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं।

अंशुमन पुष्कर, जिन्होंने पवन मल्होत्रा के किरदार के युवा संस्करण की भूमिका निभाई है, ने भी अच्छा अभिनय किया है। इस युवा अभिनेता के पास अमिताभ बच्चन के बाद सबसे अच्छी सिनेमाई आवाज है। पुष्कर/मल्होत्रा की प्रेमिका के रूप में वामिका गब्बी ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। इस भूमिका के लिए जो अल्हड़पन आवश्यक था, वह उन्होंने बाकायदा व्यक्त किया है। अंशुमान पुष्कर के साथ उसका एक खाली रेलवे प्लेटफाॅर्म पर आलिंगन प्रेम का एक उत्कृष्ट क्षण है, जिससे सीरीज के अन्य हिस्सों की कोई बराबरी नहीं है।

मुझे यह जानकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि ग्रहण साहित्यकार सत्य व्यास के उपन्यास चैरासी पर आधारित है। हमारे देश में इतनी समृद्ध साहित्यिक विरासत है, जिसे अब अजय राय और समीर नायर जैसे उद्यमी निर्माताओं द्वारा डिजिटल प्लेटफाॅर्म पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

ग्रहण कहाँ देखी जा सकती हैं ?

ग्रहण जो की 8 एपिसोड की सीरीज हैं वह हॉटस्टार की वेबसाइट पर यह फिर गूगल स्टोर  हॉटस्टार की मोबाइल ऍप डाउनलोड करके देखी जा सकती हैं ।

ग्रहण Trailer:

 

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