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जावेद अख्तर ने ठुकराया शरद पवार का राजनीतिक ऑफर

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Javed Akhtar Turns Down Sharad Pawar’s Political Offer
Javed Akhtar Turns Down Sharad Pawar’s Political Offer

कवि, विचारक, पटकथा लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता जावेद अख्तर द्वारा तीसरे मोर्चे के लिए महाराष्ट्र के शक्तिशाली राजनेता शरद पवार के साथ हाथ मिलाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। मंगलवार दोपहर श्री पवार द्वारा आयोजित एक बैठक में जावेद अख्तर ने भाग लेकर इन अटकलों को और हवा दे दी।  

हालांकि, जावेद साब के बेहद करीबी सूत्र ने उनके राजनीति में आने की सभी अटकलों को खारिज कर दिया।
सूत्र का कहना है, हां, उन्हें शरद पवार जी ने मंगलवार को एक बैठक के लिए आमंत्रित किया था, जिसमें एक नया राजनीतिक गठबंधन बनाने की पेशकश की गई थी। जावेदजी देश के सामने आने वाले मुद्दों पर चर्चा करने के लिए समान विचारधारा वाले शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों के साथ शरद पवार के साथ बैठक कर रहे थे। चर्चा का उद्देश्य दलगत राजनीति से ऊपर उठना था। जावेदजी को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि शरद पवार जी के साथ उनकी चर्चा मीडिया की नजर में है। हालांकि वे किसी राजनीतिक गठबंधन में शामिल नहीं हो रहे हैं।

सूत्र ने स्पष्ट किया कि न तो जावेद और न ही उनकी पत्नी शबाना आजमी सक्रिय राजनीति में विश्वास करती हैं। वे दोनों मानते हैं कि एक राजनीतिक दल में शामिल होना व्यक्ति की विचारधारा पर बेड़ियाँ डाल देता है क्योंकि राजनीतिक दल की सच्चाई व्यक्ति की सच्चाई बन जाती है।

जावेद अख्तर ने एक दोस्त से यह भी कहा कि राजनीति एक समझौता है। जावेद साहब के दोस्त ने बताया कि स्वयं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उनकी बुद्धि के लिए उनका सम्मान किया जाता है और वे निष्पक्ष रहना चाहते हैं।  

2019 में जावेद साब के कांग्रेस में शामिल होने की अफवाहें थीं, जब उन्होंने उनके लिए एक गीत लिखा था। इस अफवाह के बारे में जावेद साब ने मुझे जवाब दिया था “देखिए, अगर कोई राजनीतिक पार्टी थोड़ी भी सच्ची धर्मनिरपेक्ष दिखती है तो उसकी इज्जत करनी चाहिए। मुझे लगता है कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के लिए कुछ हद तक चिंता दिखाती है। मुझसे चुनाव के लिए कांग्रेस के लिए एक गीत लिखने के लिए संपर्क किया गया था। मैंने हामी भर दी और गाना लिखा मैं ही तो हिंदुस्तान हूं”

2019 में भाजपा के साथ अपने मोहभंग पर चर्चा करते हुए जावेद साब ने कहा, “जब वह (भाजपा) सत्ता में आई तो बहुत उम्मीद थी। आम लोगों को लगा कि भाजपा उनकी समस्याओं का समाधान करेगी। यह व्यापक रूप से महसूस किया गया था कि भाजपा धु्रवीकरण और सांप्रदायिकता की राजनीति को दूर कर देगी। कौन जानता था कि वे कुछ ही समय में एक विभाजनकारी राजनीति का अभ्यास करेंगे? हाँ, मुझे लगता है कि हम सभी में गहरी निराशा की भावना है। वास्तविक मुद्दों को उठाने के बजाय हम ऐसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो महत्वहीन हैं।

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